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Steven Spielberg

स्टेशनरी की दुकान से उसके पिता ने बुकमार्क (किताब में चिन्हित करने का कागज) खरीदा। उसने देखा की पिता ने बुकमार्क के बदले पैसा दिया। वह अपने पिता के साथ दुकान से आगे बढ़ा गया और घर जाकर पिता से पूछा कि हमें बुकमार्क के लिये डाॅलर खर्च करने की क्या जरूरत है जबकि डाॅल को हीं बुकर्माक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। उसके इस सवाल का जवाब तो पिता ने नहीं दिया पर उसके इस सवाल की खूब तारीफ की और अपने घर आने वाले लोगों से वह भी यहीं सवाल पूछता। उसने अपने पिता से फिर से सवाल किया कि मेरे इस सवाल से आप इतने उत्साहित क्यों हैं तो उसके पिता ने जवाब दिया कि इसमें एक नया नजरिया छिपा है और तुम हमेशा अपने आस-पास की चीजों को इसी नजरिए से देखना।

12 साल की उम्र में उसने पहली बार थिएटर में फिल्म देखी तो उसके दिमाग में फिल्मों को नए नजरिए से पेश करने का ख्याल आया और 15 साल की उम्र में अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटी सी फिल्म बनाई। हालांकि इसे किसी ने नहीं देखा। यहां तक कि खुद को भी पसंद नहीं आई लेकिन फिल्म बनाने का जुनून ऐसा चढ़ा कि इसके सिवाय कुछ और रास हीं नहीं आता था। बाद में उसने स्कूल और दोस्तों के साथ कईं फिल्में बनाई जिनकी खूब तारीफ हुई। उसने फिल्म निर्माण की पढ़ाई करने के लिये दक्षिणी कोलंबिया विश्ववि़़द्यालय के फिल्म स्कूल में दाखिला लेना चाहा लेकिन उसे दो बार दाखिला नहीं मिला।

उसने निराश होने की जगह यूनिवर्सल स्टूडियो में बिना पैसे के काम करना शुरू कर दिया। उसने स्टूडियो में काम करते हुए हीं 35 एमएम के कैमरे से 26 मिनट की एक शाॅर्ट फिल्म एम्बलिन बनाई जिसे देखकर यूनिवर्सल स्टूडियो के वाईस-प्रेसिडंेट सिडनी सेनबर्ग बहुत प्रभावित हुए। जिस लड़के को फिल्म निर्माण के अध्ययन के लिए दाखिला नहीं मिला वह अचानक हीं दुनिया का सबसे कम उम्र का पेशेवर निर्देशक बना जिसे यूनिवर्सल जैसे दिग्गज फिल्म स्टूडियो ने लंबे वक्त के लिए चुना। आज दुनिया का शायद हीं कोई कोना होगा जहाँं स्टीवन स्पीलबर्ग को नहीं जाना जाता।

उम्र के नाजुक दौर में माता-पिता अलग हुए, स्कूल में कईं बार अलग धर्म का होने की कीमत चुकाई और कईं बार भारी नाकामी झेली लेकिन कभी अपने नजरिए को नहीं बदला। स्पीलबर्ग के मुताबिक “स्कूल के दिनों में कईं बार मेरी नाक सिर्फ इसलिए तोड़ी गई क्योंकि मैं उन सभी से अलग धर्म का था। मुझे एससीयू में इसलिए दाखिला नहीं दिया गया क्योंकि मैं अलग तरह की फिल्में बनाना चाहता था। मेरी फिल्मों को लोगों ने इसलिए पसंद नहीं किया क्योंकि वे अलग तरह की थीं, लेकिन सबसे ज्यादा फक्र और खुशी मुझे आज मेरी पहचान औरों से अलग होने की वजह से हीं है।” एक वक्त स्पीलबर्ग को दाखिला देने से मना करने वाले संस्थान साउथ कोलंबिया यूनिवर्सिटी में आज स्पीलबर्ग बतौर ट्रस्टी जुड़े हैं और संस्था द्वारा आमंत्रित कर मानद डिग्री दी गई। स्पीलबर्ग का इस पर कहना है कि जरूरी नहीं कि आपको कामयाबी उसे रास्ते से मिल जाए जिस पर सब चलते हैं। असल में कामयाबी के पीछे आपका नजरिया होता है। स्पीलबर्ग के मुताबिक हमें खुद को उन चीजों या रास्तों तक सीमित नहीं कर लेना चाहिए जो दिखते हैं, बल्कि अपने रास्ते उन सपनों में तलाशने चाहिए जिन्हें लोग विकल्प नहीं मानते। हमारा वजूद हमारा नजरिया है जिसे दूसरों से अलग होना हीं चाहिए।

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